शक करते रहे थे उम्र भर
चुगली थी इस कदर गैरों की...
चर्चा शहर में आम हो गया
शहर फिर बदनाम हो गया..
वो इस कदर नादान थे
यूँ बेखबर हो हवाओं से..
रोकते भी कैसे खुद को
मचले अरमान थे अदाओं पे
"व्याकुल" खुद के भी न रहे
जो कातिल हो गये गुनाहों के..
@व्याकुल
आस पास तड़पते लोगो को देखना और कुछ न कर पाना कितनी कोफ़्त होती है न। व्याकुलता ऐसे ही थोड़े न जन्म लेती है। कितना तड़प चुका होगा वो। रक्त का एक एक कतरा बह रहा होगा। दिल से कह ले या आँखों से। ह्रदय ग्लानि से कितना विदीर्ण हो चुका होगा। पैर भी ठहर गए होंगे। असहाय इस दुनिया में सिवाय एक निर्जीव शरीर के।
यह बात 80 के दशक की होगी। नानी के घर एक जालीदार अलमारी थी इसे उर्दू में नियामत खाना भी कहते है। यह अलमारी नानी के अपने छोटे से कमरे में थी। ...
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