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गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

रिक्शा


यूँ जिन्हे तलाश रहा
वों डरे हुए से बैठे है
नज़र कर मुझ पर
बावस्ता मंजिल हूँ

सिल दिये क्यों मुझें
तड़पता सा राह पर
इशारा ही कर देना
गले आ लिपटूँगी 

वजह हो खफा का
या गुम हो शहर से
इधर महकती हवा से
पैगाम खुद का दे जाना

लहर सी तरंगे पैरों मे
खुद ब खुद चल दे
करे महसूसियत उनका
या आ जाना ख्यालों में

@व्याकुल

नियामत खाना

यह बात 80 के दशक की होगी। नानी के घर एक जालीदार अलमारी थी इसे उर्दू में नियामत खाना भी कहते है। यह अलमारी नानी के अपने छोटे से कमरे में थी। ...