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सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

हाला

(कॉलोनी के सामने मधुशाला। बगल में स्कूल व सामने विश्वविद्यालय)

मेरे कॉलोनी के सामने वाली सड़क पर अचानक निगाह गयी.. देखता रह गया .. इतनी भीड़.. वहाँ कभी रेस्टोरेंट हुआ करता था.. जहाँ शायद ही कभी भीड़ दिख जाए.. देखा तो पता चला की बच्चन साहब की हाला रंग जमाये हुए है.. क्या बूढ़े क्या जवान.. सभी अपने ख़ुशी और गम को एक ही जंक्शन पर आदान प्रदान करते देखे जा सकते है.. इशारों इशारों में बात करते.. कुछ बड़े लोग गाड़़ियों में ही बैठकर अपने चेले से सहायक सामग्री मंगाकर रसपान कर रहे है.. बगल में बैठी सरस्वती कुढ़ती हुई झांकने का प्रयास करती की इसी मधुशाला पर कितनी बार कविता पाठ हो गयी और विद्वता अपने गहरे सागर में गोते लगाई..आज इसी सरस्वती को इस दुर्दशा.. कितनी बार कहा जा चुका है मन पर नियंत्रण नही तो कुछ भी नही। अब मन को एकाग्रता का इतना अचूक साधन.. विद्यार्थियो को 'काक चेष्टा बको ध्यानम्' जैसा मूल मन्त्र के इससे कारगर उपाय.. एक बार जो लत लगी फिर भटकने की आवश्यकता नही..सिर्फ और सिर्फ इसी की धुन फिर तो कुछ भी संभव.. भटकने का सवाल ही नही.. बाल स्कूल तो है ही ..वही से लत लग गयी तो तकनीकी विश्वविद्यालय तक तो गूँज रहेगी ही... 
@व्याकुल

नियामत खाना

यह बात 80 के दशक की होगी। नानी के घर एक जालीदार अलमारी थी इसे उर्दू में नियामत खाना भी कहते है। यह अलमारी नानी के अपने छोटे से कमरे में थी। ...