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शनिवार, 29 जनवरी 2022

अस्तित्व

 


शून्य ही

रखना

जुड़ सकू

कही भी

नही सम्भाल

पाऊँगा

दम्भ

मद

सा 

खुद को...


अट्टहास

कराने को

न 

बनू

दशानन

या

जलाया

जाऊँ

जन जन में...


आहार

बनू

चीटियों का

और 

ओढ़

सके

कोई उरंग

ढेर को....


@व्याकुल

नियामत खाना

यह बात 80 के दशक की होगी। नानी के घर एक जालीदार अलमारी थी इसे उर्दू में नियामत खाना भी कहते है। यह अलमारी नानी के अपने छोटे से कमरे में थी। ...