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शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

टेटुआ



जमीं पर 

बिकते

चंद सब्जी

मोल-भाव

करते 

अंतिम

गुंजाइश तक

और

टेटुआ

में

टटोलते

खनकते सिक्कें..


फिर

निरीह से

लौट 

लेते 

फिर न 

सुनायी

देती

हाट की

कोई भी

आवाज

भर जाती

शुन्यता

सें

बच्चे की

आशा भरी

पोर..


@व्याकुल

नियामत खाना

यह बात 80 के दशक की होगी। नानी के घर एक जालीदार अलमारी थी इसे उर्दू में नियामत खाना भी कहते है। यह अलमारी नानी के अपने छोटे से कमरे में थी। ...