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गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

 


31 अक्टूबर, 1984


"पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी जी की पुण्य तिथि पर सादर नमन💐"


वह शायद मेरे जीवन का सबसे भयावह दिन था। सुबह सुबह ही सूचना मिली की इंदिरा गाँधी नहीं रही। तब रेडियो का ज़माना था। कुछ ही माह पहले इलाहाबाद में दूरदर्शन का उद्घाटन किया गया था। आग की तरह उनके हत्या की सूचना पूरे शहर में फैल रही थी।


मै 7वीं का विद्यार्थी था। समझ नहीं पा रहा था कि यें क्या हों रहा। दिन चढ़ते ही हर तरफ शोर ही शोर। मै अपने छत से देख रहा था डी ए वीं कॉलेज के मैदान से पत्थरबाजी साफ साफ दिख रहा था।


हृदय द्रवित हों रहा था। शोर धीरे धीरे चीख पुकार में बदलती जा रही थी। कही कही सड़को पर आग में सामान जलाये जा रहें थे।


रेडियो पर इंदिरा जी की वों भाषण बार बार आ रहें थे "जब मैं मरूंगी, तो मेरे खून का एक-एक कतरा भारत को मजबूत करने में लगेगा।" 


जो उन्होंने अपनी हत्या से एक दिन पहले, 30 अक्टूबर 1984 को भुवनेश्वर के एक भाषण में कहा था।


मै छत पर खड़ा यें सब देख रहा था। तभी देखता हूँ एक महिला अपनी दो लड़कियो को लेकर सड़क पर भागते हुए मेरे गेट पर आयी और सुरक्षा हेतु गेट खटखटाने लगी। मेरी माँ ने तुरंत इनको घर के अंदर किया। जब माहौल कुछ शांत हुआ तब वों लोग गये। 


इस घटना को हुए 41 वर्ष हों गये लेकिन वों घटना आज भी आँखों के सामने तैर जाता है।


बस कुछ समय के बाद जब मिलिट्री का फ्लैग मार्च हुआ तब जाकर स्थिति कण्ट्रोल में आयी।


@डॉ विपिन पाण्डेय

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