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गुरुवार, 30 दिसंबर 2021

कथरी

घुटने को माथे तक सिकोड़ ली

गरीब की कथरी जब पैरो से सरक गयी...

आँसु बेसुध से बह गये

रोटी की भूख से जब पड़ोसी तड़प गये...

माथे की लकीरे बयाँ कर गयी

खेत की बेहन जब दगा कर गयी...

फंदा तलाशता रहा रात भर

वो भी मुझसे दगा कर गयी...

नजरे चुरा फिरता रहा 'व्याकुल'

खेत रेहन से जो उलझ गयी...

@व्याकुल

नियामत खाना

यह बात 80 के दशक की होगी। नानी के घर एक जालीदार अलमारी थी इसे उर्दू में नियामत खाना भी कहते है। यह अलमारी नानी के अपने छोटे से कमरे में थी। ...