सदियों
की शोषित
परम्परा
जाल का
खेल
कौन
नही बुनता..
और
शिकारी
टकटकी
लगाये रहता
फिर
मादकता
से
चमक उठता
मांसल से
देह का..
@व्याकुल
आस पास तड़पते लोगो को देखना और कुछ न कर पाना कितनी कोफ़्त होती है न। व्याकुलता ऐसे ही थोड़े न जन्म लेती है। कितना तड़प चुका होगा वो। रक्त का एक एक कतरा बह रहा होगा। दिल से कह ले या आँखों से। ह्रदय ग्लानि से कितना विदीर्ण हो चुका होगा। पैर भी ठहर गए होंगे। असहाय इस दुनिया में सिवाय एक निर्जीव शरीर के।
सदियों
की शोषित
परम्परा
जाल का
खेल
कौन
नही बुनता..
और
शिकारी
टकटकी
लगाये रहता
फिर
मादकता
से
चमक उठता
मांसल से
देह का..
@व्याकुल
डॉ कृष्णावतार पाण्डेय बड़े मामा डॉ कृष्णावतार पाण्डेय जी पूर्व में निदेशक, शिक्षा विभाग रहें है। आपने गणित विषय में पी. एच. डी. की है। आपन...