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शनिवार, 28 अगस्त 2021

प्रदूषण



हवायें गुफ्तगु 

कर रही

नैनो से

फुसफुसाये यूँ

आँसु न रूके

पलको की..


जलें यूँ जैसे

पेट के लिए

रतिजगा

किये हो

शहर बदहवास है 

बैचैन क्यों

दम क्यों घुट रहा

आगोश में

उसके..


ऊँचाइयों का

अर्थ क्या

इतना ही है

जहॉ छलनी हो

जाये तन

जीन की

परिष्कृता पर

हो जाये सेंध..


@व्याकुल


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