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रविवार, 27 फ़रवरी 2022

सूखे पत्ते


पतझड़

के मौसम

में

पेड़ से

गिरते

झरते

सूखे पत्ते...



तंद्रा

भंग करती

हर-पल

प्रतिपल

अहसास कराती

साथ होने का

जैसे

छाँव दिया था

कभी....


बसंत 

भले ही गढ़े

खुद को

नयेे कोपलों

से 

पर

ख्वाहिश

रहती

उन सूखे

पत्तों की

जो

गिरते रहे थे

सर पर

जैसे

बुजुर्ग सा

आशीर्वाद

दे रहे हो

काँपते-हिलते

हाथों से.....


@व्याकुल



8 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. शुक्रिया भाईसाहब... प्रणाम


      सूखे पत्ते...
      (कविता)

      https://vipinpanday.blogspot.com/2022/02/blog-post_27.html

      हटाएं
  2. लाजवाब रचना व बेहतरीन अभिव्यक्ति

    जवाब देंहटाएं

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