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रविवार, 21 दिसंबर 2025

डॉ कृष्णावतार पाण्डेय

 डॉ कृष्णावतार पाण्डेय 


बड़े मामा डॉ कृष्णावतार पाण्डेय जी पूर्व में निदेशक, शिक्षा विभाग रहें है। आपने गणित विषय में पी. एच. डी. की है। आपने साठ के दशक में प्रो. आर. सी. खरे के मार्गदर्शन में पीएचडी में नामांकित थे। पीसीएस में चयन के उपरान्त पीएचडी छोड़ना पड़ा था। दुबारा प्रो कन्हैया शंकर उपाध्याय के supervision में पीएचडी पूर्ण की। पीसीएस परीक्षा में आपने टॉप किया था। उस समय तक के इतिहास में आपके इंटरव्यू में सबसे ज्यादा अंक प्राप्त हुए थे। इंटरव्यू में आपके बेबाकी व ज्ञानपूर्ण तर्क से सदस्यों में सकारात्मक प्रभाव की वजह से ऐसा सम्भव हों पाया था। शांत स्वभाव की वजह से आपने पहला विकल्प शिक्षा विभाग ही दिया था। 


छात्र जीवन में आप साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित रहें हैं।

केरल तक छात्र जीवन में आप लोहिया की सभाओं में उपस्थित रहें हैं। राहुल सांकृत्यायन से बहुत ही प्रभावित थे आप। 


सन 2000 में सेवानिवृत के उपरान्त आप CPI(ML) के कोर कमेटी में थे आप। Central Control Committee के सदस्य रहें हैं जो उक्त पार्टी के शीर्षथ अनुशासनात्मक समिति हैं। CPI(ML) की अनुषगिक संगठन People Union for Human Rights (PUHR) के पूरे उत्तर प्रदेश के प्रभारी रहें हैं। 

CPI(ML) पार्टी के प्रचार हेतु आप बिहार तक में शहाबुद्दीन के खिलाफ प्रचार किये थे। CPI(ML) पार्टी से ही आप मेयर का चुनाव भी प्रयागराज से लड़ चुके हैं।


फिलहाल तार्किक दृष्टिकोण के नाते CPI(ML) से आपका मोहभंग हों चुका हैं। 



पूरे परिवार के लिये प्रेरणाश्रोत रहें है। अपने बेटे की शादी आपने बिना दहेज़ व बिना भीड़ की किये थे। 


फिलहाल सेवानिवृत के बाद 86 वर्ष की आयु के साथ प्रयागराज में समय व्यतीत कर रहें हैं।


@डॉ विपिन पाण्डेय 


(आज जब मैं pic लें रहा था और बोला भी था कि कुछ लिखूंगा तों बोले थे मैंने अपने जीवन में किया ही क्या हैं जो लिखोगे )

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

 


31 अक्टूबर, 1984


"पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी जी की पुण्य तिथि पर सादर नमन💐"


वह शायद मेरे जीवन का सबसे भयावह दिन था। सुबह सुबह ही सूचना मिली की इंदिरा गाँधी नहीं रही। तब रेडियो का ज़माना था। कुछ ही माह पहले इलाहाबाद में दूरदर्शन का उद्घाटन किया गया था। आग की तरह उनके हत्या की सूचना पूरे शहर में फैल रही थी।


मै 7वीं का विद्यार्थी था। समझ नहीं पा रहा था कि यें क्या हों रहा। दिन चढ़ते ही हर तरफ शोर ही शोर। मै अपने छत से देख रहा था डी ए वीं कॉलेज के मैदान से पत्थरबाजी साफ साफ दिख रहा था।


हृदय द्रवित हों रहा था। शोर धीरे धीरे चीख पुकार में बदलती जा रही थी। कही कही सड़को पर आग में सामान जलाये जा रहें थे।


रेडियो पर इंदिरा जी की वों भाषण बार बार आ रहें थे "जब मैं मरूंगी, तो मेरे खून का एक-एक कतरा भारत को मजबूत करने में लगेगा।" 


जो उन्होंने अपनी हत्या से एक दिन पहले, 30 अक्टूबर 1984 को भुवनेश्वर के एक भाषण में कहा था।


मै छत पर खड़ा यें सब देख रहा था। तभी देखता हूँ एक महिला अपनी दो लड़कियो को लेकर सड़क पर भागते हुए मेरे गेट पर आयी और सुरक्षा हेतु गेट खटखटाने लगी। मेरी माँ ने तुरंत इनको घर के अंदर किया। जब माहौल कुछ शांत हुआ तब वों लोग गये। 


इस घटना को हुए 41 वर्ष हों गये लेकिन वों घटना आज भी आँखों के सामने तैर जाता है।


बस कुछ समय के बाद जब मिलिट्री का फ्लैग मार्च हुआ तब जाकर स्थिति कण्ट्रोल में आयी।


@डॉ विपिन पाण्डेय

रविवार, 5 अक्टूबर 2025

किलकिल नदी

किलकिल नदी

किलकिल नदी या किलकिला नदी, भारत के मध्य प्रदेश राज्य के पन्ना जिले में अवस्थित केन नदी की एक सहायक नदी है। यह नदी "छापर टेक पहाड़ी" से शुरू होकर पन्ना टाइगर रिजर्व से गुजरती है। पन्ना जिले में 45 किमी बहने के बाद यह केन नदी में मिल जाती है। इसे पन्ना की हीरे उगलने वाली नदी भी कहा जाता है। यहां क्षेत्रीय लोग हीरा ढूढ़ने भी आते है। इस नदी का नाम किलकिला पक्षी के नाम पर है। किलकिल पक्षी का दूसरा नाम कॉमन किंगफिशर है, जिसे किलकिला, राम चिड़िया, या मछरेंगा भी कहते हैं। किलकिला (किंगफिशर) तालाबों और नदियों के पास रहता है और मछलियाँ पकड़ने में माहिर होता है। इसका निशाना बहुत सटीक  होता है। पानी के अंदर से मछली पकड़ने के लिए तेजी से गोता लगाती है। बहाव बहुत तेज होने की वजह से आवाज़ करती नदी थी हालाँकि एक जगह यह नदी शांत थी

@डॉ विपिन पाण्डेय "व्याकुल"


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बुधवार, 30 जुलाई 2025

छत

 



सारे जवां आहा नाचे-नाचे

अऊआ अऊआ, अऊआ अऊआ


बप्पी लहरी का यें गाना खूब जोरो पर था। समग्र प्रताप कुछ दिन पहले ही मोहल्ले में आया था। वह महाराष्ट्र से था। 


उन दिनों जाड़े का सीजन था। वैसे जाड़े के मौसम में संजीव साब पर  फिल्माया गाना "जाड़ों की नर्म धूप और आँगन में लेट कर... आँखों पे खींचकर तेरे आँचल के साए को" सुबह रेडियो पर यह गाना सुनायी पड़ जाता था तो धूप में और भी जादू बढ़ जाता था।


समग्र जिस मकान में किराये में रहता था उस मकान के छत व बगल वालें घर के छत के बीच दस फीट की दीवार थी। 


समग्र नया नया टेप रिकॉर्डर  लाया था। उस वक्त डिस्को थीम के गाने तेज आवाज़ में सुनता था। पूरे मोहल्ले के लिये आकर्षण का केंद्र था।


सब बढ़िया चल रहा था। पहले  मोबाइल जैसी कोई चीज होती नहीं थी।  गप्प, ठहाके व चुटकुलो का दौर चलता था तो खत्म होने का नाम ही नहीं लेता था।


बगल के छत से जुड़ी हुई दीवार से पता नही कब एक ईट निकल जाने से झरोखा बन गया था। समग्र ज्यादातर उस झरोखे पर आता है फिर वापस छत के दूसरे कोने में चला जाता था।


माहौल और जोशीला होता जा रहा था। उषा उत्थप ने इंट्री लें ली थी अब। "रम्भा हो हो संभा हो हो... रम्भा हो हो संभा हो हो... मैं नाचू तुम नाचो...." ने लय पकड़ ली थी।


वों रात आज भी नहीं भूल पाता हूँ। समग्र रात को तेजी से चीखा था। लगा कोई गले को दबा रहा है। घना अंधेरा था। समग्र चेहरा नहीं देख पाया। जाते जाते चेतावनी दे गया था कोई। अगली बार उठ भी नहीं पाओगे। 


सुबह हुई की नहीं। समग्र बड़बड़ाता जा रहा था। यू. पी. के लोग अच्छे नहीं। सामान तेजी से पैक कर रहा था। कुछ दिनों बाद बगल की छत भी खामोश हो गयी थी। 


बस वों झरोखा कई बहकती साँसों का गवाह बन कर रह गयी थी.......


@डॉ विपिन पाण्डेय "व्याकुल "


शनिवार, 24 मई 2025

धाकड़ पथ

 धाकड़ पथ..


पता नही इस विषय में लिखना कितना उचित होगा पर सोशल मीडिया के युग में ऐसे सनसनीखेज समाचार से बच पाना मुश्किल ही होता है। किसी ने मजाक में ही कही लिखा था की इसका नाम "धाकड़ पथ" होना चाहिये लेकिन ऐसे तो हर शहर, हर मोहल्ले में धाकड़ मार्ग होगा।


ऐसे ही हमारे मोहल्ले मीरापुर के एक गली में एक धाकड़ पकड़ा गया था। वों इतना धाकड़ था की पकड़ने वाले को प्रतिदिन धमकाता था बाद में पकड़ने वाले को समझौता करना पड़ा था। कई बार हमें अपने घर के बगल वाले मार्ग में धाकड़ मार्ग का एहसास हुआ था। वाद परिवाद का साक्षी भी रहा हूँ। कई धाकड़ आज भी रो रहें। 


बी. एच. यू में पढ़ाई के दौरान PMC चौराहा का पता चला था। इसकी धाड़कता का अंदाज़ नहीं पर बगल वाला PCB जरूर धाकड़ रहा होगा।


 शायद ऐसा ही कोई मोहल्ला या कॉलेज का कोना आपके शहर में भी होगा। पता करिये उस धाकड़ लेन का।


😂😁

@विपिन पाण्डेय 

बुधवार, 19 मार्च 2025

रानी अब्बक्का



500 साल पहले पुर्तगाल के व्यापारी हिंद महासागर के समुद्री रास्ते कब्जा चुके थे। भारत पर आक्रमण करने की तैयारी थी लेकिन उनकी इस योजना को विफल किया रानी अब्बक्का ने। आधुनिक इतिहास में यूरोपियों से स्वतंत्रता संग्राम करने वाली पहली योद्धा रानी अब्बक्का ही हैं। पुर्तगाली और रानी अब्बक्का के बीच पहला युद्ध 1555 में लड़ा गया। दूसरा 1558 में और तीसरा 1567 में। रानी अब्बक्का ने तीनों बार पुर्तगालियों को धूल चटा दी।


अब्बक्का को लोगों ने भुला दिया था। 2009 में भारतीय कोस्ट गार्ड में एक पेट्रोलिंग जहाज ICGS Rani Abbakka तैनात किया गया।


चौटा के राजा तीरुमाला राय तृतीय (Thirumala Raya III) की राजधानी उल्लाल थी। चौटा वंश मातृसत्ता का पालन करता था और राजा तीरुमाला तृतीय का राज उनकी भतीजी अब्बक्का को मिला था।

सोमवार, 10 मार्च 2025

समय का पहिया

 


वह जोमैटो में डिलीवरी बॉय बन गया था। रात दिन कभी इधर तो कभी उधर। बस शहर के चक्कर लगाते रहना है। 


कभी किसी कॉलेज के हॉस्टल में जाना होता था तो कॉलेज के पुराने दिन याद आ जाते थे यह भी याद आता था की कैसे उसका  विद्यार्थी जीवन  आनंदमय रहा था।


 कभी सुबह के नाश्ते में पोहा बड़ा ही पसंद आता था। उसकी वजह यह थी कि मिताली को सुबह पोहा कैंटीन में चाहिए था। वह मिताली को बेहद पसंद करता था तो उसने भी पोहा खाने की आदत बना ही ली थी और कितनी ही बार मैंने उसका पेमेंट भी किया था।


मैंने तो पोहा ही खाना छोड़ दिया था जबसे कॉलेज लाइफ छोड़ा। आज अचानक पता नहीं क्यों मिताली बहुत ही याद आ रही थी जैसे लग रहा था कि वह इसी शहर में कहीं है। 


 एक फ़ूड कोर्ट मैं आर्डर लेने के लिए खड़ा ही था मुझे कैश में एक महिला दिखाई दी। मेरे तो जैसे पंख ही लग गए थे। मैं ध्यान से देखा तो मिताली ही लगी।इतने बड़े रेस्टोरेंट की मालकिन। मै खुश हो गया। मैं तुरंत बाइक को स्टैंड पर लगाया और पास गया। " मिताली!!!  पहचाना" उसने बोला, ” मुझे याद तो नहीं आ रहा” मैंने कहा, "हर सुबह हम लोग दिल्ली कॉलेज कैंटीन में पोहा खाते थे" "क्या तुम्हें कुछ भी याद नहीं” उसने कहा, ”कुछ भी याद नहीं, पहले यह बताओ तुम क्या कर रहे हो” मैंने बताया कि "मैं जोमैटो में डिलीवरी बॉय हूँ" उसने बोला, "सॉरी, पहचान नहीं पा रही हूं” मैंने कहा, ”ठीक से देखो, मै मुकेश।" 


 "मै किसी मुकेश वुकेश को नहीं जानती" पर यह याद रखना डिलीवर करने जाते हो तो फीडबैक लेना मत भूलना। 


सारे स्टाफ के चेहरे पर व्यंगात्मक हसीं थी। इस जवाब से मैं ज़मीन में गड़ गया। चलते वक्त सिर्फ इतना ही सुन पाया था की "यह तब भी लफँगा था और आज भी वैसा ही है।"


मै बहुत जल्दी वहां से बहुत दूर चला जाना चाहता था।


@डॉ विपिन पाण्डेय "व्याकुल"




बुधवार, 5 फ़रवरी 2025

घुसपैठिया

घुसपैठिया नहीं मानता 

इंसानों को 

जों गरीबी 

लाचारी 

मज़बूरी 

में घुस आते है 

पड़ोसी देशों में 

पड़ोसी परदेशों में।


घुसपैठिया मानता हूँ 

ललितपुर को

सहारनपुर को 

बलिया को 

जों खुल्लम खुल्ला 

घुस जाते है 

पड़ोसी परदेशो में।


मज़ाल है कोई 

निकाल सके 

या सीधे रेखा 

खींच सके 

जैसे गांवो में 

हम मेढ़ो के साथ 

करते है...


@डॉ विपिन पाण्डेय "व्याकुल"




सोमवार, 3 फ़रवरी 2025

ख़्वाहिश

पता है मुझे वों सीतारें है फ़लक के 

जमीं पर रहें पाँव के निशाँ जरूर देखना 


बदलते मौसम की गठरी ग़ुरूर की ज़ब हो 

बहते हुए पसीने की आजिज़ी जरूर देखना


बढ़ चुके जों कदम छोड़ कर तन्हा मुझे 

समय मिले तो पुराने तोहफ़ो को जरूर देखना 


किस्से किताबों में ज़ब दफ़न हो जाये 

पहले पन्ने की सिसकियों को जरूर देखना


खूब करें गुफ़्तगू अजनबी तमाशाइयों से 

साहिल रहें उस शाम "व्याकुल" जरूर देखना


@डॉ विपिन पाण्डेय "व्याकुल"


आजिज़ी = बेबसी




सोमवार, 30 दिसंबर 2024

डोम तम्बू

नीचे चित्र देना अत्यावश्यक हो गया था। अब धर्म का भी व्यवसायीकरण हो गया है। सोशल मीडिया डोम तम्बू के साथ तैर रही इस प्रचार को देखे, "इस डोम सिटी मे गोलाकार आकार मे ट्रांसपेरेंट 360 डिग्री से कुम्भ मेले का अनोखा नज़ारा लें इस डोम तम्बू को काफ़ी ऊंचाई पर बनाया गया हैँ जहाँ से बेड पर लेट कर भी कुम्भ का नज़ारा ले सकते हैं।


ये कुंभ मेला में सबसे महंगा रेसिडेंशियल स्पेस है जहां एक रात के लिए 80,000 से 1,20,000 चुकाने होंगे।"

हमारे भारत में सैकड़ो ऐसे उदाहरण है जहां लोगो ने राजपट त्यागा फिर धर्म में आगे बढे। पर ऐसा कभी हुआ है कि 360 डिग्री से धर्म मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।

क्या यह सिर्फ धनाढ्य लोगो तक ही सीमित रहने वाली है। व्यभिचार व पर्यटन का सबसे सस्ता प्रचार है। जबकि विदेशियों को मथुरा व बनारस की गलियां ही अधिक भाती है...

हिन्दुस्तान में धनाढ्य कितने ही है आखिर। रिपोर्ट भी कुछ ऐसा कहती है "भारत में आय वितरण शीर्ष पर अत्यधिक केंद्रित है। शीर्ष 10% (9 करोड़ लोग) औसतन 13 लाख रुपये से अधिक वार्षिक आय अर्जित करते हैं। शीर्ष 1% (90 लाख लोग) सालाना 53 लाख रुपये से अधिक कमाते हैं, और शीर्ष 0.1% (9 लाख लोग) 2 करोड़ रुपये से अधिक कमाते हैं। शिखर पर, शीर्ष 0.01% (लगभग 10,000 लोग) सालाना 10 करोड़ रुपये से अधिक कमाते हैं, और शीर्ष 9,223 व्यक्ति औसतन 50 करोड़ रुपये कमाते हैं।"(https://sabrangindia.in/the-growing-divide-a-deep-dive-into-indias-inequality-crisis/)

@डॉ विपिन पाण्डेय"व्याकुल"

बुधवार, 18 दिसंबर 2024

कॉफी हाउस


यह कॉफी हाउस है। कभी यहां जमावड़ा लगा रहता था इलाहाबाद के विभिन्न विधाओ के नामचीन हस्तियों के। यहां की दीवारे कई बतकहो की साक्षी रही है। अगर गवाहों की बात होंगी तो यहां की दीवारे भेद खोल देंगी। कभी प्रयागराज आये तो यहां बैठे 2-4 कॉफ़ी पीये बहुत शुकुन मिलेगा। यदि आप कवि है तो शब्दों के भण्डार मिलेंगे, नेता है तो राजनीतिक जोड़तोड़ का हौसला मिलेगा, कम्पटीशन की तैयारी कर रहें है तो उर्जित हो कर जायेंगे। कभी आइये प्रयागराज तो बेमतलब के ही यहां बैठ जाइये फिर बताइये आपको क्या मिला.....

@डॉ विपिन पाण्डेय

मंगलवार, 17 दिसंबर 2024

भिखारी ठाकुर


आज भिखारी ठाकुर जी की जयंती है। भिखारी ठाकुर  भोजपुरी के बहुत ही नामचीन और बड़े गायक हैं उन्होंने परदेश पर कई गीत और गाने लिखे हैं इसमें मुझे "विदेशिया" याद आ रहा है, (उस जमाने में बहुतायत में लोग परदेस चले जाते थे) जों परदेस गये लोगो पर है। सालों घर बातचीत नहीं हो पाती थी। परिवार गांव में ही छोड़कर चले जाते थे। बाद में पाती या चिट्ठी कह सकते हैं आप, वही एक माध्यम होता था उनके आपस के संचार के लिए या बातचीत के लिए। लेकिन यह उस जमाने में मुझे जो थोड़ा बहुत याद है कि भिखारी ठाकुर की जो पंक्तियां थी वह एक अनुभव से होकर गुजरती है। यह भी मुझे याद है व बचपन में देखा करता था कि ज़ब गांव में लोग कमाने के लिए जाते थे तो घर की औरतें घेर लेती थी और वह बड़े मान सम्मान के साथ विदा करती थी। सब अच्छे से अपना आशीर्वाद और दुआएं देते थे और मजाल है कि कोई कुछ निगेटिव बोल दे या कुछ ऐसा सामान या कोई ऐसी वस्तु उनके सामने पड़ जाए कि जो अपसुकून  की श्रेणी में आ जाए। गांव की जो भी प्रथा थी वह बहुत ही आत्मिक थी। और गांव में यह सब घर तक ही सीमित नहीं था अगर गांव का कोई भी व्यक्ति परदेश जा रहा है जैसे मुंबई या कोलकाता में। तो उससे भी कहा जाता था कि उनका हाल-चाल जरुर लीजिएगा और पाती में उनका भी समाचार दीजिएगा। या गांव का कोई व्यक्ति परदेश से वापस अपने गांव आता था तो उससे पूछा जाता था कि हमारे परदेसी कैसे हैं। अनायास ही आज भिखारी ठाकुर की जयंती पर यह सब मुझे याद आ गया।

@डॉ विपिन पाण्डेय 

मंगलवार, 23 जुलाई 2024

वापसी

वापसी की बेला में

वों

स्वयं ही 

रह जाता है

उस अहसास

के साथ

जिसमें 

दर्द छुपा होता है

बहुत सी बातों का

कुछ अनकहे

बंद हो जाती है कानें

खींच लेती है

लक्ष्मण रेखा

उन 

कहकहों से।


दिमाग में

घेर लेती है

चक्रव्यूह सी

शून्यता

जो

खेल 

खेलता रहता है

तुझे

अभिमन्यु समझ कर

अब या

लड़ रण में

या

आत्मसमर्पण कर।


@डॉ विपिन "व्याकुल"




सोमवार, 11 सितंबर 2023

नियति

 

मालती उदास थी। विवाह हुये छः महीने हो चुके थे। विवाह के बाद से ही उसने किताबों को हाथ नही लगाया था। बड़ी मुश्किल से वह शादी के लिये तैयार हुई थी। बाबू जी का कहना था , "बिटिया, बाकी की पढ़ाई तुम ससुराल में ही करना"

ससुराल आने के पहले ही दिन मालती का ख्वाब धाराशाई हो गया था। पति श्याम लाल अनपढ़ थे। पंद्रह दिन ही बीते थे कि पति मुम्बई चले गये थे। पति मुम्बई में वॉचमैन (सिक्योरिटी गार्ड) थे। बार के गेट पर नाईट शिफ्ट की ड्यूटी करते थे। कमाई खूब थी। बार में आने वाले नोट पकड़ा जाते थे। 

पति के मुम्बई जाने के बाद से मालती छः महीने ससुराल रही। वह बी. ए. फाईनल वर्ष में थी। दर्शन शास्त्र उसका पसंदीदा विषय था। अंतिम वर्ष का इम्तहान नजदीक था। उसने समझ लिया था। बी. ए. के बाद शायद ही आगे की पढ़ाई सम्भव हो पाये। तर्कशास्त्र की सारी युक्तियाँ समाप्त हो चुकी थी।

पति श्याम लाल को कस्टमर पैसे के साथ- साथ मुफ्त में शराब की बोतल पकड़ा देते थे। वह खुशी खुशी शराब घर ले आता। अब उसकी लत पड़ चुकी थी। संगत भी बिगड़ने लगी थी उसकी।

मालती की दूसरी विदाई अब होनी थी। श्याम लाल भी अब मुम्बई से आ चुका था। गॉव में एड्स चेकअप हेतु कैम्प  लगा था। अगले दिन श्याम लाल ने भी अपना टेस्ट करवाया था। रिपोर्ट आने के बाद श्याम लाल के पॉजिटिव आने की खबर सारे गॉव में आग की तरह फैल गयी थी। 

मालती के दूसरी विदाई के अब दो ही दिन ही बीते थे। एड्स की खबर सुनते ही उसके होश फाख्ता हो गये थे। उसने ससुराल न जाने का फैसला कर लिया था।

तीन महीने बाद सूचना मिली कि श्याम लाल दुनिया छोड़ चुके है। मालती उदास थी। पास के एक स्कूल में अध्यापन कर जीविका चलाने लगी। आगे की शिक्षा के लिये प्रोत्साहित थी। 

मालती स्कूल सोचती हुई जा रही थी कि अब जमाना सिर्फ साक्षर होने का ही नही है वरन् अच्छी शिक्षा होने से भी है।

तभी ई-रिक्शा वाले की घंटी ने उसके अवचेतन मन  को बाहरी दुनिया से जोड़ दिया था...... और तब तक वह स्कूल पहुँच चुकी थी....

मालती के जीवन में अब ठहराव आ गया था। स्कूल में बच्चों को बड़े मनोयोग से पढ़ाती थी। कुछ महीने बाद बी. ए. का परीक्षाफल घोषित हो गया था। स्कूल के अलावा शाम को घर पर ट्यूशन पढ़ाने लगी थी वों।

स्कूल में किसी को भी उसके व्यक्तिगत जीवन के बारे में खबर नही थी। वह उदास व गंभीर रहती। 

स्कूल वालों का विश्वास उस पर बढ़ गया था। प्रबंधक उसके कार्य से प्रभावित होकर अन्य प्रबंधकीय कार्य सौंपने लगा। प्रबंधक युवा व अविवाहित था। एक दिन प्रबंधक ने उससे पूछ ही लिया था, "मालती, तुम विवाहित हो?"

मालती अचानक इस प्रश्न से सकपका गयी थी। बस हॉ ही बोल पायी थी।

अब प्रतिदिन प्रबंधक समय से आने लगे। दोनों की बातचीत भी खूब होने लगी। 

एक दिन प्रबंधक उसके घर अचानक पहुँच गये। मालती के माता- पिता से उनकी मुलाकात हुई। बातचीत में मालती के विधवा होने का पता चला। अब प्रबंधक 2-4 दिन में मालती के घर आने लगे।

एक दिन प्रबंधक ने मालती का हाथ उनके पिता से माँग लिया। पिता क्या बोलते, "हामी भर दी थी"

हँसी- खुशी मालती का जीवन चल रहा था। पाँच वर्ष कब बीत गये मालती को पता ही नही चला। 

इधर प्रबंधक उदास रहने लगे। उनकों पुत्र की अभिलाषा थी। क्रोध नाक पर आ गया था। मालती से कम बात करते थे। इतने बड़े घर में मालती उपेक्षित थी।

एक दिन किसी कार्य से अपने प्रबंधक पति से मिलने उनके चैम्बर तक गयी। अंदर से आवाज आ रही थी "तुम चिंता न करों। मैं उसके खाने में मीठा जहर मिला रहा हूँ। थोड़ा समय लगेगा पर अपना काम बन जायेगा।" वह नयी टीचर को बाहों में समेटे हुये थे।

अगली सुबह स्कूल में हड़कम्प मचा हुआ था। मालती की खोज जारी थी। प्रबंधक हतप्रभ थे। 

मालती ने काशी के अनाथालय का रुख कर लिया था।


@डॉ विपिन "व्याकुल"

गुरुवार, 10 अगस्त 2023

फ्लाईंग किस



सन् 1990 की घटना है। हमारे एक मित्र थे। तब उस वक्त सलमान की फिल्मों का बोल-बोला युवाओं पर सर चढ़ कर बोला करता था। उस वक्त के अधिकांश युवा फुल बाह की लाईनदार टीशर्ट पहने रेंजर साईकिल पर घूमा करते थे व कॉलेजों में ईलू ईलू गाने पर झूमा करते थे। 

मित्र के मन में फितूर सवार रहता था। छत पर खड़े होकर बन्धुवर ताक-झाँक में लगे रहते थे। अब वह छत पर सुबह सुबह ही आ जाते थे। घर के पीछे एक लड़की पर उनका दिल आ गया था। एक दिन उनके मन में पता नही क्या भूत सवार हुआ उस लड़की पर फ्लाईंग किस दे मारी... पर लड़की कम कलाकर नही थी .... तुरन्त ही स्वीकार भी कर ली।

मित्र के तो मानो पंख ही लग गये थे। 
"आज मै ऊपर.. आसमां नीचे..." गाना गुनगुनाने लगे थे।

अगले दिन की सुबह का बेसब्री से उन्हे इंतजार था। लड़की ने उन्हे घर के पीछे वाले दरवाजे पर बुलाया था। पहुँचते ही सामान्य परिचय के बाद मित्र लौट आये थे।

अब मित्र प्रतिदिन उसके घर के पिछवाड़े जाने लगे और फ्लाईंग किस का भी जोरदार ढंग से आदान-प्रदान होने लगा। मित्र को उस लड़की ने बताया कि शनिवार को घर पर कोई नही है। पीछे के दरवाजे से आ जाये। मित्र सुबह से ही शेव वगैरहा करके क्रीम इत्यादि लगाकर उसके घर तय समय पर पहुंच गये थे। 
आधे घंटे मुश्किल से हुये होंगे मित्र के चिल्लाने की आवाज सुनी मैने। मै भागकर पीछे की गली में पहुच गया। मित्र लात जूतों से धुने जा रहे थे। लड़की कह रही थी "भैया, इसकों और धुनिये.. यह प्रतिदिन मुझे फ्लाईंग किस करता है...

मै दुःखी मन व लाचारी से मित्र की धुनाई देखता रहा।

@डॉ विपिन "व्याकुल"

मंगलवार, 30 मई 2023

क्रिकेटाम्बुकम्


आई पी एल मैच जब भी देखता हूँ तो वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना जाग्रत हो उठती है। क्षेत्रवाद की भावना से लखनऊ सुपर जायंट्स (LSG) का सपोर्ट करने की कैसे सोचता जब पता चला कि कप्तान साहब के. एल. राहुल है। यू. पी. वाली फिलिंग नही आ पा रही है। यही हाल बाकी टीम की भी है। बस खिलाड़ी के बढ़िया खेल को ही आधार मानकर सपोर्ट कर रहे है। गुजरात टाइटन्स व चेन्नई सुपर किंग्स के बीच के फाईनल मुकाबले में ऊहापोह की स्थिति थी। समझ नही आ रहा था किसको सपोर्ट करे। तभी एकाएक "सर्वे भवन्तु सुखिन:" की भावना जोर मारने लगी। कोई भी जीते हमे क्या!!!!


एकबारगी चेन्नई सुपर किंग्स के हारने का भय सताने लगा। फिर क्या था??? 


शिव मंगल सिंह सुमन की वाणी,

"क्‍या हार में क्‍या जीत में

किंचित नहीं भयभीत मैं...."


भय हंता का काम कर गयी।


पठानियों से लेकर गोरो की भी बेरोजगारी दूर हो गयी वो भी आउटसोर्स के सहारे। वाह रे हिन्दुस्तानियों... ग्लोबलाईजेशन का सदुपयोग तो सही मामले में आप ही कर रहे है....


वों दिन दूर नही 10-10 (टनटन) टूर्नामेंट हर जिले का हो जिसमें विदेशी खिलाड़ी क्रिस मॉरिस... बेन स्टोक्स.. कानपुर भौकाल या प्रयाग बकईत टीम से खेलते दिख जायें....


@डॉ विपिन "व्याकुल"

रविवार, 26 फ़रवरी 2023

चमचागीरी

 


आज जब चमचागीरी एक शान का विषय माना जाता है व किसी बड़े नेता के आगे-पीछे फोटो खिचवाना गर्व का विषय समझा जाता है। राजा हरि सिंह ठीक इसके उलट थे। वो चमचागीरी से बहुत ज्यादा चिढ़ते थे। उन्होनें चमचागीरी के लिये एक खिताब तय किया था जिसका नाम ‘ख़ुशामदी टट्टू’ था। इसमे बन्द दरबार में हर साल सबसे बड़े चमचे को "चाँदी और काँसे के भीख माँगते टट्टू की प्रतिमा" दी जाती थी। आज आवश्यकता है हर स्तर पर इस तरह के ‘ख़ुशामदी टट्टू’ जैसे पुरस्कारों की शुरुआत करने की ताकि चिन्हित किया जा सके चापलूसों को।


@डॉ विपिन "व्याकुल

कऊड़ा


कऊड़ा को छोटा पंचायत स्थल कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी। मचई साधे कऊड़ा के चारों ओर देश दुनिया की चर्चा का शीतकालीन सत्र कहना ही होगा। झगड़े की सम्भावना नही के बराबर ही रहता है क्योकि मजाल है कोई आग की तपिश छोड़ दे। मचई में बईठई का हक घरे का वरिष्ठों को ही रहता था। वईसे पियरा का छोटी-छोटी गोल गद्दियाँनुमा बनती थी। बाल्यावस्था में उसी पर बैठने का हक था। कऊड़ा जलानें का हुनर कुछ ही लोगो को होता था। कंडी या लकड़ी का सामंजस्य कैसे सेट किया जाये कि देर तक अग्नि प्रज्जवलित होता रहे। धूँआ आँख पर लगने पर ये कहा जाता था कि सासू बहुत मानती है..यह सुनकर मन प्रफुल्लित होना स्वाभाविक ही है। आलू या शकरकन्द को भून कर खाने का अलग ही मजा होता था।


@डॉ विपिन "व्याकुल"


मायाजाल

 


बगल से वो निकली ही थी। एक ही झलक देख पाया था मै। मुस्कुराई थी वों।  मन में गुदगुदी होना स्वाभाविक ही था। पहले भी कई बार उसे देखा था पर कभी चेहरे पर निगाह गयी ही नही। आज अॉफिस के मोड़ पर मेरी बाईक और उसकी एक्टिवा आमने-सामने थी। मुस्कुरा रही थी वों। 


अब तो लगभग डेली ही उससे मुलाकात हो जाया करती थी। जब भी पास से निकलती, मुस्कुराते हुये ही मिलती। अब तो मुझे उसकी टाईमिंग भी समझ में आ गयी थी। उसी समय मै भी घर से निकलने लगा। 


कई दिन हो गये थे उसकों मुस्कुराते हुये। आज मन का नियन्त्रण समाप्त हो चुका था। विश्वामित्र साक्षात प्रगट हो चुके थे। काम का गुन ही होता है किं वों आपके बुद्धि को कैद कर ले। आज मै भी कैद में था। मेरी बाईक उसकी एक्टिवा के सामने थी।


मैने उससे पूछना चाहा ही था, "तुम्हारा नाम क्या है... कहॉ जॉब करती हो"


मुझे लगा वों किसी और से बात कर रही। कह रही थी, "रुकों यार, एक सिरफिरा नाम पूछ रहा है??" इसकों निपटा लू पहले।


मै कुछ समझ पाता.. इससे पहले उसने गले में लिपटी नागपाश जैसी किसी चीज को हटाया। ब्लूटूथ ही थी नागपाश के रूप में। 


मैने उसको उसकी मुस्कुराहट के बारे में पूछा। उसने आश्चर्यचकित होकर मुझे देखा। बोली भाई!!! " मै किसी और से बात करती हूँ" " कृपया आप गलतफहमी न पालें"


वों फुर्र से हवा हो गयी।


मै जड़वत् रहा व उसके ब्लूटूथ की महिमा का शिकार हो चुका था।


@डॉ विपिन "व्याकुल"

शनिवार, 25 फ़रवरी 2023

जगत रहा भैया तू सोए मत जईहा

"जगत रहा भैया तू सोए मत जईहा"


'बलम परदेशिया' फिल्म का यह गाना मोहम्मद रफी द्वारा गाया गया है। ये गाना माया मोह से विमोह के लिये प्रेरित करता है। पसीने की कमाई पर जोर दिया गया है। बचपन का मेरा प्रिय गाना रहा है। 


सोशल मीडिया पर कई-कई ग्रुप है। जब भी कोई मैसेज आता है। ये गाना याद आ जाता है। जैसे प्रेरित कर रहा हो "सोए मत जईहा"


आप सोने जा रहे हो और टन टन बज जाये तो मजाल है आप सो जाये। कभी-कभी मोबाइल रात को टन टना जाता है। एक बार ये सोच कर फोन उठाईये कि देखू कोई महत्वपूर्ण मैसेज तो नही। पास-पड़ोसी वाले मैसेज तो देखना ही पड़ेगा। "जगत रहा भैया" इतना जगा रहा है जितना रात भर कभी इम्तहान में भी नही जगे होंगे।


अगर गाने का आनन्द लेना हो तो सुनते रहिये और सोशल मीडिया को सोचते रहिये...


https://youtu.be/iUKDq5wPkBo

 

अगर आप मोबाइल के दूसरे किनारे पर बैठे शख्स को "जगत रहा भैया तू सोए मत जईहा" के पैमाने पर कसना चाहते है तो रात 2-3 बजे जरूर मैसेज करते रहिये और गाना खुद सुनिये उसे भी सुनाइये.....


@डॉ विपिन पाण्डेय "व्याकुल"

डॉ कृष्णावतार पाण्डेय

  डॉ कृष्णावतार पाण्डेय  बड़े मामा डॉ कृष्णावतार पाण्डेय जी पूर्व में निदेशक, शिक्षा विभाग रहें है। आपने गणित विषय में पी. एच. डी. की है। आपन...